जीवन को प्रयोगशाला मत बनने दो

 

लाडो,जीवन को प्रयोगशाला मत बनने दो i


लाडो                                           https://youtu.be/8Xpt818Z9VM

आज जो जीवन तुम्हारा है,

उसके लिए प्रसव का दर्द सहा था मैंने

रातों को जागकर तुम्हें थपकाया था

अपनी इच्छाओं को दबा,

 तुम्हारी मालिश के लिए ऑलिव ऑयल मंगवाया था।

लाडो

आज जो जीवन तुम्हारा है,

चाची की बाहों ने झूला झूलाया था उसे

मौसी ने चलना सिखाया था

नानी ने तुम संग बचपन जीया था

नानू ने पढ़ना सिखाया

चाचा ने खिलौनों से आंगन भरा था तुम्हारा।

लाडो

आज जो जीवन तुम्हारा है,

पापा की आँखों ने सुंदर सपने सजाए थे उस पर।

दादा का सीना गर्व से भर आया था

दादी ने जरूर थोड़ा मातम मनाया था

पर लाडो

आज जो जीवन तुम्हारा है,

घर के एक-एक सदस्य ने अपनी सांसों से सींचा है।

अब बारी तुम्हारी है।

अपनापन दिखाने की

अपनों से जुड़े रहने की

अपनों के संग जीने की।

अपने लिए तो जानवर भी जीते हैं

कष्टों से लड़कर जब इंसान

खुद को अपनों के बीच पाता है

तभी वह संपूर्ण कहलाता है।

क्योंकि लाडो

अपनों के गुण-दोष हम जानते हैं

परायों को समझने में तो सदियाँ बीत जाँगी।

फिर पछताए कुछ नहीं होगा

तब तक तो चिड़िया खेत चुग जागी।

लाडो

हम हैं साथ तुम्हारे सदा

तुम्हारी खुशी और हर पल में।

पर नहीं देख सकते

जीवन में कष्टों को चुनते हुए।

अपनों से बेगाना बनते हुए।

मन में लिए कसक

सपनों का महल बुनते हुए।

लाडो

जीवन तो तुम्हारा ही होगा,

पर उसमें जोश कुछ टूटा होगा

स्वागत तो फिर भी होगा तुम्हारा

बस मन कुछ रूठा होगा।

स्वागत में बाँहों का जोश कुछ ढीला होगा।

लाडो

समाज बदलने वाले जीवन भर संघर्ष में जीते हैं।

अपनों को मार ठोकर जो आगे बढ़ते हैं

जीवन में बस चैन-ओ-सुकून ही खोते हैं।

अपनों के अरमानों को पाँव तले रौंद

तुम भी न खुश रह पाओगी,

मन ही मन कभी तो पछताओगी।

जरूरी नहीं हर अनुभव को पाने के लिए

कांटों से भरी राह पर चलना ही हो ।

बड़ों के अनुभवों से जो सीखे

इंसान वही तरक्की कर पाता है।

लाडो

माना जीवन तुम्हारा है

पर उस पर अपनों का कर्ज भी भरा है।

उनको दर्द देकर ही क्या तुम

ऋण के बोझ तले दब न जाओगी।

मांग नहीं रही कुछ तुमसे

मैं हक अपना जता रही हूँ।

जीवन के अनमोल 26 सालों की तपस्या का

जो हर एक पल बिना स्वार्थ के मैंने तुम्हारे लिए गुजारे हैं।

और अगले 26 भी गुजार देने की तमन्ना में हूँ।

पर टूट कर और बिखर कर नहीं।

सपनों में इंद्रधनुष के रंग लेकर चली थी मैं।

पर पता नहीं काली स्याही दी उडेल किसी ने,

अपनी ही चटक चांदनी रात में

अमावस का ग्रहण लगा है जो,

बैठी हूँ आस में

नए सूरज की पहली किरण के इंतजार में।

लाडो

इतनी कमजोर नहीं मेरी उम्मीदें हैं

और न ही गम है अपनी परवरिश पर।

मेरे भी अरमानों की भोर तो होगी

सूरज की पहली किरण की लाली भी होगी।

कह दिया है अपने खुदा से मैंने

तू भी देख, मैं भी देखूँगी,

माँ से तो तू भी न जीत पाया है।

लाडो

यह जीवन तुम्हारे अकेली का नहीं है।

चंद खुशियों के मोहपाश में,

खुशियों का भरा समंदर तुम ठुकरा नहीं सकती।

यों गमों के अंधेरे देकर हमें

तुम जीवन अपना संवार नहीं सकती।

लाडो

माना जीवन तुम्हारा है,पर इसे प्रयोगशाला मत बनने दो¡

Comments

Post a Comment